मेहरू कलां के राठौड़ वंशज नहीं मनाते गणगौर: युद्ध, बलिदान और बंद हुआ किले का द्वार, आज भी नहीं निकलती सवारी
सावर 21 मार्च (केकड़ी पत्रिका/हंसराज खारोल)राजस्थान की समृद्ध परंपराओं में गणगौर का पर्व विशेष स्थान रखता है, लेकिन अजमेर जिले के मेहरू कलां गांव में यह पर्व आज भी नहीं मनाया जाता। इसके पीछे एक मार्मिक और ऐतिहासिक घटना जुड़ी है, जिसने इस परंपरा को हमेशा के लिए थाम दिया।इतिहास और जनश्रुतियों के अनुसार, जवाहर सिंह के पिता भारत सिंह के शासनकाल में मेहरू कलां का गणगौर महोत्सव दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। यह पर्व अत्यंत धूमधाम, श्रद्धा और शाही ठाठ-बाट के साथ मनाया जाता था।
ईसर-गौरा की सवारी पूरे गांव में निकाली जाती थी, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होते थे।बताया जाता है कि एक बार कादेड़ा के तत्कालीन शासक गणगौर महोत्सव का आनंद लेने के बहाने मेहरू कलां पहुंचे। लेकिन यह आगमन केवल एक बहाना साबित हुआ। अवसर मिलते ही उन्होंने अचानक गांव पर आक्रमण कर दिया। यह हमला इतना अचानक और भीषण था कि पूरे क्षेत्र में अफरा-तफरी मच गई।इस युद्ध में भारी मारकाट और तबाही हुई। मेहरू कलां के शासक भारत सिंह ने वीरता से मुकाबला किया, लेकिन युद्ध के दौरान वे और उनके एक विश्वस्त कामदार वीरगति को प्राप्त हो गए। गांव के कई योद्धाओं ने भी अपने प्राण न्योछावर कर दिए।इसी युद्ध के दौरान कादेड़ा के शासक बलपूर्वक गणगौर की प्रतिमाएं अपने साथ ले गए। यह घटना गांव के लिए गहरा आघात साबित हुई।
इस अपमान और त्रासदी के बाद मेहरू कलां में गणगौर की सवारी निकालना सदा के लिए बंद कर दिया गया।इतना ही नहीं, किले के जिस द्वार से अंतिम बार गणगौर की सवारी निकली थी, उसे हमेशा के लिए बंद करवा दिया गया। उस द्वार को दीवार में चुनवा दिया गया, ताकि वह घटना हमेशा के लिए स्मृति में बनी रहे। इसके बाद किले की उत्तर दिशा में नया द्वार बनवाया गया।इस घटना के बाद से आज तक मेहरू कलां में राठौड़ वंश गणगौर का पर्व नहीं मनाता है। यह परंपरा आज भी गांव की पहचान बनी हुई है, जो एक ओर वीरता, बलिदान और स्वाभिमान की कहानी कहती है, वहीं दूसरी ओर उस ऐतिहासिक पीड़ा को भी जीवित रखे हुए है, जिसने एक पूरे उत्सव को हमेशा के लिए थाम दिया।