जिनशासन कभी किसी की आंखों में आंसू नहीं देखना चाहता — मुनि सुश्रुत सागर

केकड़ी 25 अगस्त (केकड़ी पत्रिका न्यूज पोर्टल) देवगांव गेट के पास विद्यासागर मार्ग पर स्थित चंद्रप्रभु चैत्यालय में वर्षायोग के लिए विराजित मुनिराज सुश्रुत सागर महाराज ने आयोजित धर्मसभा में प्रवचन करते हुए कहा कि व्यक्ति को गुणग्राही बनना चाहिए। किसी के भी अवगुणों की तरफ ध्यान नहीं देकर गुणों को धारण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को हंस के समान बनना चाहिए। हंस की विशेषता यह है कि वह पानी मिले दूध में से दूध- दूध मूल तत्व सार- सार पी लेता है और पानी छोड़ देता है। मुनिराज ने अवगुणी व्यक्ति का जोंक का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार जोंक गाय के स्तन पर चिपककर भी खून ही चूसती है, दूध नहीं पीती है। उसी प्रकार अवगुणी व्यक्ति गुणों को छोड़कर अवगुण ही ग्रहण करता है।
मुनिराज ने कहा कि त्यागी की त्याग रूपी देह की अलग ही चमक होती है। तपस्या से जो आत्मा चमकती है उसका अलग ही अतिशय होता है। मुनि की अलौकिक ,असाधारण वृति होती है। मुनियों के तप से चेतन चमकता है और उससे चमत्कार होते हैं। मुनि अपनी शक्ति को नही छिपाते हुए निरन्तर कठोर से कठोर तपश्चरण करते हुए अपने चारित्र और संयम को बढाते हैं। वे परमार्थ की प्रवृत्ति करने वाले होते हैं,समाज को जोड़ने का काम करते हैं। साधु अपनी आत्मा के कल्याण के लिए अपना धर छोड़ता है इसलिए गृहस्थ,श्रावक का कर्तव्य भी है कि वह साधु की चर्या कराने में पूर्ण सहयोग करें। जिनशासन की वीतरागता , दिगम्बरत्व ही जिनशासन की महिमा है, पहचान है। जिनशासन कभी किसी की आंखों में आंसू नहीं देखना चाहते है। तभी जाकर उनकी आत्मा निर्मल और पवित्र होती है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति शरीर को सुंदर बनाने और सुंदर दिखाने के लिए अनेक उपाय करता हैं बार- बार दर्पण में निहारता हैं। ये दर्पण बाहरी आवरण को ही दिखाता है लेकिन जिनेन्द्र भगवान का जिनवाणी रूपी दर्पण हमारी आत्मा के विकारी परिणामों कषाय मोह राग- द्वेष भावों को दिखाते हैं। जिनवाणी चार प्रकार के अनुयोगों प्रथमानुयोग ,करणानुयोग, द्रव्यानुयोग और चरणानुयोग के माध्यम से हमारी आत्मा को
समझाती है ,दिखाती है। चेतना – आत्मा को देखने ,समझने और जानने के लिए प्रज्ञा – ज्ञान चक्षु खोलना आवश्यक है।
मुनि श्री ने कहा कि सोने को कसौटी पर धिसकर परख की जाती है कि उसमें कितनी मात्रा सोने की एवं कितनी मात्रा अन्य धातुओं की है। उसी प्रकार भेद-विज्ञान रूपी कसौटी पर आत्मा को रखकर देखना होगा कि हमारी आत्मा में कितने विकारी परिणाम, अपवित्रता है। हमें संसार के दुःखों को हटाने के लिए सम्यक प्रज्ञा को जागृत करकर अपनी आत्मा का सम्यक श्रद्धान करना चाहिए।
दिगम्बर जैन समाज एवं वर्षायोग समिति के प्रवक्ता नरेश जैन ने बताया कि मुनिराज के प्रवचनय् से पहले चित्र अनावरण, दीप प्रज्ज्वलन एवं मुनि सुश्रुत सागर महाराज के पाद प्रक्षालन करने का सौभाग्य विमल चंद निखिल कोठारी परिवार को मिला।